कल शाम से ही सिरहाने
कुछ ख़त रखे थे पुराने
फ़िर रात-भर का रिझाना
उलफ़त लगी है सताने
ऊनी से लिबासों में सिमटे रहें
आवाज़ें ख़यालों के सुनते रहें
शाम से दिल को बहला रहे हैं तेरे नाम से
शाम से आँखें महरूम दस्तकों के इनाम से
तेरे बिना, तेरे सिवा जिएँ अगर
सूख जाए ना मन का ये शजर
हाँ, आँखों में तू, बातों में भी तेरा ज़िकर
कैसे जीते हैं? तू ही फ़र्ज़ कर
चुप्पी में ज़ुबानों को सुनते रहें
हम फ़जर की अज़ानों को सुनते रहें
शाम से दिल को बहला रहे हैं तेरे नाम से
शाम से आँखें महरूम दस्तकों के इनाम से
शाम से...
हाँ, हाँ




