ज़ख़्म हैं पीठ पे खंजरों के कईं
हर नई चोट पे क्यूँ होता है ना यक़ीं
"धीरे-धीरे हम सीख लेंगे," कहा है हर दफ़ा
पर कभी सोच समझ के भी करता है कोई वफ़ा
हम तो क़सम से दोबारा
उसी मोड़ मुड़ जाएँगे
'गर आग सुलगेंगी दिल में
दोबारा जल जाएँगे
क़सम से, हाँ, क़सम से
हम तो ऐसे ही हैं, अपनी फ़ितरत यही
"ऐसा कब तक चलेगा?" पूछते हैं सभी
"धीरे-धीरे हम सीख लेंगे," कहा है हर दफ़ा
पर कभी सोच समझ के भी करता है कोई वफ़ा
हम तो क़सम से दोबारा
उसी मोड़ मुड़ जाएँगे
'गर आग सुलगेंगी दिल में
दोबारा जल जाएँगे
क़सम से, हाँ, क़सम से
"धीरे-धीरे हम सीख लेंगे," कहा है हर दफ़ा
पर कभी सोच समझ के भी करता है कोई वफ़ा
हम तो क़सम से दोबारा
उसी मोड़ मुड़ जाएँगे
'गर आग सुलगेंगी दिल में
दोबारा जल जाएँगे
हम तो क़सम से दोबारा
उसी मोड़ मुड़ जाएँगे
'गर आग सुलगेंगी दिल में
दोबारा जल जाएँगे
क़सम से...

