আকাশ কেন ডাকে, মন ছুটি চায়
ময়ূরপঙ্খী মেঘ ওই যায়, ভেসে যায়
আকাশ কেন ডাকে, মন ছুটি চায়
ময়ূরপঙ্খী মেঘ ওই যায়, ভেসে যায়
দূর থেকে দূর, আরো বহুদূরে
পথ থেকে পথ চলি ঘুরে ঘুরে
ভাঙা এ মন নিয়ে আমি
একা একা চলেছি কোথায়
ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए
मुझे डोर कोई खींचे, तेरी ओर लिए जाए
एक रूठी हुई तक़दीर जैसे कोई
ख़ामोश ऐसे है तू तस्वीर जैसे कोई
तेरी नज़र बनके ज़ुबाँ, लेकिन तेरे पैग़ाम दिए जाए
ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए
मुझे डोर कोई खींचे, तेरी ओर लिए जाए
ये शाम मस्तानी मदहोश किए जाए
मुझे डोर कोई खींचे, तेरी ओर लिए जाए





