ज़रा सा रुक ज़रा ज़रा ओ ज़िंदगी
ठहर ज़रा दो मुझको करने दिललगी
ये तुम किनारा और मैं गुम हुआ मुसाफ़िर
कुछ न चाहूँ तुमको पाना बस है सुन लो ज़िंदगी
जो तुम न हो तो लगता ना है दिल कहीं
कभी तो सुन लो मेरी बातें बिन कही
बस इतना चाहेंगे जब तुमसे है शुरू तो फिर
तुम्ही पे हो ख़त्म मेरी ये ज़िंदगी
तो पल ठहर ज़रा मैं देख लूँ तुझे जी भर
ये तुम हो मैं हूँ और कुछ नया न हो ज़िक्र
यूँ ही तुम बाहों में पड़े रहो जी बस मेरे
और ये समा भी का से थम जाए अभी इधर
तो लफ्ज़ कहने दो मिले न मौका फिर कभी
हां दिन का ही सही सब्र में गुज़रे दिन कई
जवाब हो तुम मेरे दिल के उलझनों का जी
तभी तो बन गए हो तुम मेरी ये ज़िंदगी
नज़र के सामने हो ना कुछ और चाहिए
आ इतने दूर क्यों ज़रा करीब आइए
तुम्हारे चेहरे की खुशी भुला दे ग़म मेरे
तो कम से कम सनम ज़रा सा मुस्कुराइए
तू हाल-ए-दिल तुम्हें बता
क्यों दिल ने आखिर तुमको ही तो है चुना
तो लो पड़ो नज़र मेरी
बता देना मुझे भी जो चले आखिर तुम्हें पता
नादान-ए-दिल मेरा ये तुम पे आ मचल पड़ा
ये तुम जो हमसफ़र तो हो सफर हसी बड़ा
तू ज़िंदगी भर न थामे बेशक मुझे
पर कम से कम तू दो कदम मेरे संग में चल ज़रा
आओ हम दो चले बादलों में कहीं
लाज़मी है जहाँ तेरा मेरा है नहीं
मिलके वादे निभाने सारे तुझसे करे जो दिल ये मेरा
पुकारे लौट आना ज़िंदगी





