और नहीं, बस और नहीं
ग़म के प्याले और नहीं
दिल में जगह नहीं बाक़ी
रोक नज़र अपनी, साक़ी
और नहीं, बस और नहीं
ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं, बस और नहीं
सपने नहीं यहाँ तेरे
अपने नहीं यहाँ तेरे
सच्चाई का मोल नहीं
चुप हो जा, कुछ बोल नहीं
प्यार-प्रीत चिल्लाएगा
तो अपना गला गँवाएगा
पत्थर रख ले सीने पर
क़स्में खा ले जीने पर
क़स्में खा ले जीने पर
ग़ौर नहीं, है ग़ौर नहीं
परवानों पर ग़ौर नहीं
आँसू-आँसू ढलते हैं
अंगारों पर चलते हैं
तो और नहीं, बस और नहीं
कितना पढ़ूँ ज़माने को?
कितना गढ़ूँ ज़माने को?
कौन गुणों को गिनता है?
कौन दुःखों को चुनता है?
हमदर्दी काफ़ूर हुई
नेकी चकनाचूर हुई
जी करता, बस खो जाऊँ
कफ़न ओढ़ कर सो जाऊँ
कफ़न ओढ़ कर सो जाऊँ
दौर नहीं, ये दौर नहीं
इंसानों का दौर नहीं
फ़र्ज़ यहाँ पर फ़र्ज़ी है
असली तो ख़ुद-ग़र्ज़ी है
तो और नहीं, बस और नहीं
ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं, बस और नहीं
बीमार हो गई दुनिया
बेकार हो गई दुनिया
मरने लगी शरम अब तो
बिकने लगे सनम अब तो
ये रात है नज़ारों की
ग़ैरों के साथ यारों की
तो जी है बिगाड़ दूँ सारी
दुनिया उजाड़ दूँ सारी
दुनिया उजाड़ दूँ सारी
ज़ोर नहीं है, ज़ोर नहीं
दिल पे किसी का ज़ोर नहीं
कोई आग मचल जाए
सारा आलम जल जाए
तो और नहीं, बस और नहीं
ग़म के प्याले और नहीं
और नहीं, बस और नहीं





